स्वामी विवेकानंद के जीवन की कहानी : देने का आनंद

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स्वामी विवेकानंद के जीवन की यह एक महत्त्वपूर्ण घटना है। भ्रमण करने के बाद स्वामी विवेकानंद अपने निवास-स्थान पर लौटे। वे अपने ही हाथों से भोजन बनाते थे। वे भोजन करने की तैयारी कर ही रहे थे कि कुछ बच्चे उनके पास आकर खड़े हो गए। वे सभी भूखे मालूम पड़ रहे थे। स्वामीजी ने अपना सारा भोजन बच्चों में बाँट दिया। वहीं पर एक महिला बैठी यह सब देख रही थी। उसने बड़े ही आश्चर्य से पूछा, ‘‘आपने अपनी सारी रोटियाँ तो इन बच्चों को दे डालीं, अब आप क्या खाएँगे?’’

स्वामीजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘माता, रोटी तो मात्र पेट की ज्वाला शांत करनेवाली वस्तु है। सो इस पेट में न सही, उनके पेट में ही सही। आखिर वे सब भगवान् के अंश ही तो हैं। देने का आनंद पाने के आनंद से बहुत बड़ा है।’’

 

शिक्षा : अपने बारे में सोचने से पहले दूसरों के बारे में सोचना ज्यादा आनंददायी होता है।