लालची कौआ

230 views

पेड़ की एक हरी डाल पर चिडि़या का घोंसला था। चिडि़या घोंसले में बैठी अपने अंडे से रही थी। अचानक कहीं से एक कौआ उड़कर आया और चिडि़या से बोला, ‘‘चिडि़या-चिडि़या, मैं तेरे अंडे खाऊँगा।’’

चिडि़या बेचारी डर गई। उसने कहा, ‘‘कौए! तुम मेरे अंडे मत खाओ।’’ परंतु कौए ने  कहा, ‘‘नहीं, मैं तो तेरे अंडे खाऊँगा।’’ तब चिडि़या बोली, ‘‘तेरी चोंच गंदी है। पहले जाकर इसे धो आ, फिर मेरे अंडे खा लेना।’’

कौआ डाल पर से उड़ा और नदी के किनारे गया। नदी कल-कल करती बह रही थी। कौए ने कहा, ‘‘नदी-नदी, मुझे थोड़ा पानी दे दे। पानी से अपनी चोंच धोकर चिडि़या के अंडे खाऊँगा।’’

नदी ने कहा, ‘‘जाओ, बरतन ले आओ और पानी भर लो।’’ नदी के किनारे से उड़ता हुआ कौआ कुम्हार के पास गया। कुम्हार मिट्टी के बरतन बना रहा था। कौए ने कहा, ‘‘कुम्हार-कुम्हार, मुझे एक बरतन दे दो। मैं उसमें नदी से पानी लूँगा। पानी से अपनी चोंच धोकर चिडि़या के अंडे  खाऊँगा।’’ कुम्हार ने कहा, ‘‘जाओ, मिट्टी ले आओ, मैं उसका बरतन बना दूँगा।’’ कुम्हार के पास से उड़कर कौआ खेत के पास गया और बोला, ‘‘खेत-खेत, मुझे थोड़ी मिट्टी दे दोे। मिट्टी से बरतन बनवाऊँगा। बरतन में नदी से पानी लूँगा। पानी से अपनी चोंच धोकर चिडि़या के अंडे खाऊँगा।’’

खेत ने कहा, ‘‘जाओ, खुरपा लाओ और मिट्टी खोद लो।’’

वहाँ से उड़कर कौआ लोहार के पास गया। लोहार भट्ठी में खुरपा लाल कर रहा था। कौए ने उसके पास बैठकर कहा, ‘‘लोहार-लोहार, मुझे एक खुरपा दे दो। खुरपे से मिट्टी खोदूँगा। मिट्टी से बरतन बनवाऊँगा। बरतन में नदी से पानी लूँगा। पानी से अपनी चोंच धोकर चिडि़या के अंडे खाऊँगा।’’

लोहार ने पूछा, ‘‘कैसा खुरपा चाहिए, काला या लाल?’’

कौए ने कहा, ‘‘लाल।’’

तब लोहार ने भट्ठी में से अंगारे की तरह दहकता हुआ लाल खुरपा निकालकर कौए की पीठ पर रख दिया।

कौआ वहीं जल-भुनकर राख हो गया और चिडि़या के अंडे बच गए।