बिरसा मुंडा

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झारखंड के महानायक

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर, 1875 में उलिहातु गाँव में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह था। बिरसा मुंडा आगे चलकर एक महान् क्रांतिकारी तथा ‘धरती-आबा’ (जगत्-पिता) के नाम से विख्यात हुए। बिरसा मुंडा ने अपने समाज के लोगों को पवित्र जीवन की शिक्षा दी। देश को स्वतंत्र कराने के लिए अत्याचारी अंग्रेजों के विरुद्ध लोगों में क्रांति की ज्वाला धधकाई। बिरसा से घबराकर अंग्रेज सरकार ने छल-कपट का सहारा लिया और बिरसा को पकड़वाने पर 500 रुपए का इनाम घोषित कर दिया। आखिरकार विश्वासघातियों की मुखबिरी से रात में सोते समय बिरसा को बंदी बना लिया गया। जीवित रहते हुए बिरसा मुंडा ने अपने शौर्यपूर्ण कार्यों से अंग्रेज सरकार की नींद उड़ा दी थी, मृत्यु के बाद भी वह उसके लिए भय का कारण बने रहे। इसलिए सुवर्ण रेखा नदी के घाट पर बिरसा का शव जेल-कर्मचारियों द्वारा कंडों की आग में गुपचुप तरीके से जला दिया गया। इसकी किसी को भनक तक नहीं लगी। 9 जून, 1900 को राँची कारागार में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मौत से देश ने एक महान् क्रांतिकारी खो दिया, जिसने अपने दम पर आदिवासी समाज को इकट्ठा किया था।