बाबा तिलका माँझी

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झारखंड के महापुरुष

बाबा तिलका माँझी पहले संथाली नेता थे, जिन्होंने सन् 1789 में पहली बार अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र लड़ाई छेड़ी। अंग्रेजों द्वारा अपने संसाधन हथिया लिये जाने और उनके शोषण के विरुद्ध लड़ाई के लिए उन्होंने संथालियों को एकजुट कर ‘मुक्ति दल’ की स्थापना की।

वर्ष 1784 अंग्रेजों के विरुद्ध पहले विद्रोह के लिए जाना जाता है और इसी वर्ष ‘संथाल हूल’ की भी शुरुआत हुई थी। यह विद्रोह पूर्णतया वर्ष 1770 में पड़े अकाल का परिणाम था। अकाल के कारण स्थानीय लोग लगान देने में असमर्थ थे, पर अब न्यायालय के आदेशानुसार उन्हें पिछले 10 वर्षों का लगान भी चुकाना था। परिणामस्वरूप लोगों ने विद्रोह कर दिया। बाबा तिलका माँझी ने राजमहल पर हमला किया और ब्रिटिश कमिश्नर ऑगस्तस क्लीवलैंड को भी गुलेल से मार डाला। कमिश्नर की हत्या से बौखलाए अंग्रेजों ने तिलापोर पहाडि़यों में उन्हें घेर लिया। कई दिनों तक उनके साथियों ने उन्हें बचाए रखा, पर आखिरकार अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया। बिहार के भागलपुर में कलेक्टर के घर की तरफ जानेवाले सभी रास्तों पर उन्हें घोड़ों से बाँधकर खींचा गया और सरेआम बरगद के एक पेड़ से लटकाकर फाँसी दे दी गई।

आजादी के बाद भागलपुर में उनकी याद में एक ‘तिलका माँझी चौक’ बनाया गया और भागलपुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर ‘तिलका माँझी विश्वविद्यालय’ कर दिया गया। भारतीय इतिहास में एक देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में वे हमेशा अमर रहेंगे।