बंकिमचंद्र चटर्जी

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बच्चो, आपको मालूम है कि हमारा राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ किसने लिखा था? बंकिमचंद्र चटर्जी ने। उनका जन्म 27 जून, 1838 को कलकत्ता में हुआ था। उनकी शिक्षा वहीं पर हुई। उन्हें पढ़ाई से अधिक खेल-कूद पसंद था। वे बी.ए. की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में पास हुए। उनके पिता डिप्टी कलेक्टर थे। पिता की इच्छा थी कि बंकिमचंद्र सरकारी नौकरी में आएँ, इसलिए वे सन् 1858 में डिप्टी मजिस्ट्रेट बन गए। सन् 1857 के विद्रोह के दौरान भारत में ब्रिटिश शासन का कार्य-भार ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों से महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया था। अंग्रेजों के अत्याचार देखकर उनका खून खौल उठता था। उन्होंने अपने विद्रोही विचारों को आवाज देने के लिए कलम को अपना हथियार बनाया।

बंकिमचंद्र चटर्जी एक महान् साहित्यकार ही नहीं बल्कि देशभक्त भी थे। उन्होंने अपने साहित्य में मातृभूमि का वंदन किया और जन-जन को एक सूत्र में बाँधकर स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया। बंकिमचंद्र चटर्जी बँगला लेखक थे। उनका साहित्य बेहद उत्कृष्ट कोटि का है। इसलिए उनकी सभी रचनाओं का बँगला के साथ-साथ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। आज भी उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें चाव से पढ़ी जाती हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं—‘दुर्गेश नंदिनी’, ‘कपाल कुंडला’, ‘आनंद मठ’, ‘मृणालिनी’, ‘विषवृक्ष’, ‘चंद्रशेखर’, ‘इंदिरा’, ‘राजसिंह’ आदि। बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपनी रचनाओं में लगभग सभी पात्रों को सदाचारी दिखाया है। इतना ही नहीं बच्चो, उनकी रचनाओं में महिला पात्र भी ओज और वीरता के रस में डूबे हुए हैं। इनकी रचनाएँ पढ़कर लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और अपने देश को आजाद कराने के लिए जी-जान लगा दिया। ‘आनंद मठ’ में देशभक्ति का आदर्श प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास की आड़ में भारतीय स्वतंत्रता के युद्ध का शंखनाद भी किया गया है। ‘आनंद मठ’ के संन्यासी पात्र के माध्यम से ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष किया गया। ‘वंदे मातरम्’ शीर्षक से लिखे इस गीत ने ‘राष्ट्रीय गीत’ का दर्जा पाकर राष्ट्रीय गौरव प्राप्त किया।

कलम की ताकत बहुत प्रभावशाली होती है, इस बात को बंकिमचंद्र चटर्जी की सशक्त लेखनी ने साबित कर दिया। अगर मन में किसी भी बात को ठान लिया जाए तो उसे पूरा करना कतई मुश्किल नहीं होता। बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से आजादी की ऐसी अलख जगाई कि पूरा भारत जाग्रत् होकर एकता के सूत्र में बँध गया। इसलिए भारत 15 अगस्त, 1947 को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो सका। ऐसे महान् देशभक्त लेखक की मृत्यु सन् 1894 में हुई।