प्रेमचंद

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बच्चो! प्रेमचंद आधुनिक कथा साहित्य में नवयुग के प्रवर्तक थे। प्रेमचंद का जन्म 1 जुलाई, 1880 को बनारस से लगभग छह मील दूर स्थित गाँव लमही में हुआ। वह पिता अजायबराय और माँ आनंदी देवी की संतान थे। उनके तीन बहनें और एक छोटा भाई भी था। उनकी दो बहनें बचपन में ही अकाल मृत्यु की शिकार हो गई थीं।

प्रेमचंद का मूल नाम धनपतराय था, किंतु परिवारजन उन्हें ‘नवाब’ कहते थे। जब वह पाँच वर्ष के थे, उनकी माँ का देहांत हो गया। उसके बाद उन्हें एक करीबी गाँव के मदरसे में पढ़ने के लिए दाखिल कर दिया गया। उस समय शिक्षा में फारसी और उर्दू की खास अहमियत होती थी। उनके लिए मदरसे की यह जिंदगी बड़ी दिलचस्प साबित हुई। माँ की मृत्यु के बाद नवाब को सर्वाधिक स्नेह अपनी बड़ी बहन से मिला था। करीब चौदह साल की उम्र में प्रेमचंद की शादी कर दी गई।

उन्हें हिंदी नहीं आती थी। वह उर्दू उपन्यासों के दीवाने थे। इसी जमाने में उन्होंने ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ की भी कई जिल्दें पढ़ डालीं। उन्होंने सन् 1901 में कहानी लिखना शुरू किया। उन्होंने पहली कहानी ‘अनमोल रत्न’ उर्दू में लिखी थी, जो बहुत चर्चित हुई। सन् 1902 में उनका पहला उपन्यास ‘वरदान’ प्रकाशित हुआ। उनका अगला उपन्यास ‘प्रतिज्ञा’ विधवाओं की समस्याओं पर आधारित था। इस बीच उन्होंने देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत कई कहानियाँ लिखीं, जो पुस्तकाकार ‘सोजे वतन’ में सन् 1908 में बेहद चर्चित हुईं। सन् 1916 में प्रेमचंद का बहुचर्चित उपन्यास ‘सेवासदन’ प्रकाशित हुआ।

सन् 1920 में महात्मा गांधी के विचारों एवं कार्यों से प्रभावित होकर प्रेमचंद ने नौकरी छोड़ दी और असहयोग आंदोलन में कूद पड़े तथा जेल भी गए। इसके बाद उन्होंने कुछ अरसे के लिए खादी की दुकान खोली; मगर जब उनका भी कोई नतीजा न निकला तो बनारस में कुछ महीने तक उन्होंने हिंदी मासिक ‘मर्यादा’ का संपादन किया। बाद में उन्होंने ‘माधुरी’, ‘हंस’, ‘जागरण’ आदि पत्रिकाओं का भी संपादन किया।

सन् 1925 में प्रेमचंद का वृहद् उपन्यास ‘रंगभूमि’ प्रकाशित हुआ। इसके बाद सन् 1928 में ‘कायाकल्प’, 1931 में ‘गबन’, 1932 में ‘कर्मभूमि’, 1933 में ‘निर्मला’ और 1936 में ‘गोदान’ प्रकाशित हुए। ‘गोदान’ प्रेमचंद का श्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। प्रेमचंद का प्रसिद्ध कहानी-संग्रह ‘मानसरोवर’ आठ भागों में है। उपन्यास और कहानी के अलावा प्रेमचंद ने नाटक, निबंध, जीवनी आदि विधाओं में भी अपनी लेखनी चलाई है। गरीबी से निजात पाने के लिए उन्होंने फिल्म उद्योग में लेखन का कार्य किया।

सन् 1929 में सरकार ने प्रेमचंद को ‘रायसाहब’ की उपाधि देनी चाही, लेकिन उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया।

बच्चो! 8 अक्तूबर, 1936 को उन्होंने अपने जीवन की अंतिम साँस ली। उस समय वे छप्पन वर्ष के थे।