नन्हा धावक बुधिया

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बच्चो, बुधिया सिंह का नाम आपने जरूर सुना होगा। अरे वही बच्चा, जिसने मात्र साढ़े चार साल की उम्र में 65 कि.मी. की दूरी सात घंटे और दो मिनट में तय करके सबको चौंका दिया था। बुधिया का जन्म वर्ष 2002 में ओडि़शा में हुआ था। इसका परिवार बहुत गरीब था। खाने के लिए दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पाती थी। बुधिया की माँ ने परिवार का पेट भरने के लिए इस नन्हे मासूम को मात्र 800 रुपए में बेच दिया था। बुधिया अद्भुत बच्चा था, इसलिए बेहद गरीबी में माता-पिता से दूर होकर भी वह भारत के साथ-साथ पूरे विश्व का चहेता बन गया। एक दिन बुधिया के नन्हे तेज कदमों पर स्थानीय खेल के कोच बिरंची दास की नजर पड़ी और उन्होंने उसे गोद ले लिया। इसके बाद उन्होंने उसे मैराथन दौड़ने का प्रशिक्षण दिया।

आप सब यह सोच रहे होंगे न कि आखिर यह कैसे पता चला कि नन्हे से बुधिया के कदम बहुत तेज भागते हैं? तो बच्चो, इसके पीछे भी एक दिलचस्प घटना है। उनके कोच बिरंची दास उन्हें दौड़ने का प्रशिक्षण देते थे। वे गलती होने पर डाँट लगाते थे और सजा भी देते थे। एक दिन उन्होंने बुधिया को दौड़ लगाने की सजा दी और कहा कि वह तब तक दौड़ लगाता रहेगा, जब तक कि वह स्वयं उसे मना नहीं कर देते। बुधिया को सजा देने के बाद बिरंची दास किसी काम में व्यस्त हो गए। उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि उन्होंने बुधिया को सजा दी हुई है। पाँच घंटे बाद जब वे वहाँ लौटे तो यह देखकर हैरान रह गए कि बुधिया अभी तक दौड़ रहा था। बस, इसके बाद उन्होंने समझ लिया कि प्रशिक्षण और मेहनत से बुधिया को तेज धावक बनाया जा सकता है। तेज दौड़ने के कारण बुधिया का नाम ‘लिम्काबुकऑफवर्ल्डरिकॉर्ड्स’मेंभीदर्जहै।

आज केवल भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व के कई लोग भी बुधिया को पहचानते हैं। इतना ही नहीं, वर्ष 2016 में उसके जीवन पर एक फिल्म ‘बॉर्न टू रन’ भी बनी है। बुधिया दुनिया का सबसे नन्हा मैराथन धावक है। उसके जीवन पर बनी फिल्म ‘बॉर्न टू रन’ को 63वें राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2016 में सर्वश्रेष्ठ बच्चों की फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।

गरमी की छुट्टियों में समय मिलने पर आप भी इस फिल्म को देखना। हो सकता है कि फिल्म देखकर आप में से अनेक बच्चों के अंदर बुधिया जैसी छिपी प्रतिभा बाहर आ जाए और हमें आप जैसे बच्चों के रूप में अनेक बुधिया देखने को मिलें।