देवघर के बाबा वैद्यनाथ

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बाबा वैद्यनाथ धाम देश-दुनिया में सर्वाधिक प्रसिद्ध तीर्थ के रूप में मान्य है। पूरे श्रावण महीने में यहाँ बाबा के भत काँवर लेकर आते हैं और अपने आराध्य पर जल चढ़ाते हैं, वह भी 105 कि.मी. की पदयात्रा करके। यह देश का अकेला ऐसा पवित्र स्थान है, जहाँ भतों को इतनी कड़ी परीक्षा के बाद बाबा के दर्शन होते हैं। बाबा वैद्यनाथ का जितना ऐतिहासिक महव है, उतना ही धार्मिक भी।

संथाल परगना के देवघर जिले का यह धाम शांति और भाईचारे का प्रतीक है। बाबा वैद्यनाथ भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। वैदिक काल में इसे ‘महादेव की भूमि’ कहा गया था। काशी में बाबा विश्वनाथ, देवघर के बाबा बैजनाथ और काठमांडू (नेपाल) के पशुपतिनाथ महादेव—इन तीनों पवित्र धाम त्रिभुज के बीच का भू-भाग व्रात्य संस्कृति का क्षेत्र था, जिसके परम उपास्य महादेव थे।

राक्षसराज रावण द्वारा वैद्यनाथ मंदिर में स्थापित लिंग के बारे में एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। माना जाता है कि रावण चाहता था कि उसकी राजधानी पर शिवजी का आशीर्वाद बना रहे, इसलिए वह कैलाश पर्वत गया और भगवान् शिव की आराधना की। उसने घोर तपस्या की। एक-एक कर उसने अपने नौ सिर काटकर शिव को चढ़ा दिए। वह अपना दसवाँ सिर काटकर चढ़ाने ही वाला था कि भगवान् शिव प्रकट हो गए और उन्होंने उसके चढ़ाए सिरों को फिर से जोड़ दिया। उसकी इस कठोर आत्मदानी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्होंने वर माँगने को कहा। रावण ने वर के रूप में उस शिवलिंग को अपनी राजधानी लंका ले जाने की आज्ञा माँगी, जिस पर उसने अपने सिर काटकर चढ़ाए थे। भगवान् शिव ने उसे शिवलिंग ले जाने की आज्ञा तो दे दी, परंतु उसके साथ एक शर्त भी रख दी कि ‘यदि रास्ते में इसे कहीं रख दिया जाएगा तो यह वहीं अचल हो जाएगा।’ रावण ने शर्त स्वीकार कर ली और शिवलिंग को लेकर लंका की ओर चल पड़ा। देवगण अपने शत्रु को मिले इस वरदान से घबरा गए। एक योजना बनाई गई और विष्णु ग्वाले का वेश धरकर आए। रास्ते में रावण को लघुशंका लगी। वह शिवलिंग को उस ग्वाले के हाथों सौंपकर लघुशंका से निवृ िके लिए चल पड़ा। ग्वाले ने शिवलिंग का भार सँभालने में विवश होकर उसे वहीं भूमि पर रख दिया। रावण जब लौटकर आया, तब वह बहुत प्रयत्न करने के बाद भी शिवलिंग को नहीं उठा सका। यही ज्योतिर्लिंग ‘बाबा वैद्यनाथ’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।