थोड़ा सा प्यार

85 views

रिजवान पाँचवीं कक्षा में पढ़नेवाला छात्र था। कद थोड़ा छोटा, रंग साँवला और काया दुबली-पतली सी थी। जब भी उसे मौका मिलता, ढेला उठाकर किसी भी बच्चे को मार देता और गंदी-गंदी गालियाँ भी देता था। कक्षा में बच्चे शिकायत करते, ‘‘मैम, रिजवान घर में भी मम्मी-पापा और बड़े भाई-बहनों से बहुत मार खाता है। पर गली से गुजरने वाले बच्चों पर ढेला फेंककर मारना नहीं छोड़ता।’’ वह विद्यालय में शिक्षकों से डाँट भी सुनता, पर थोड़ा सा भी सुधार नजर नहीं आता।

लंच का समय था। कुछ दिनों पूर्व ही विद्यालय में नई मैम आई थीं, बच्चे दौड़ते हुए नई मैम के पास आए और बोले, ‘‘मैम, रिजवान ने एक बच्चे पर पत्थर मारकर उसका सिर फोड़ दिया।’’ कुछ बच्चे रिजवान को पकड़कर मैम के पास ले आए। मैम ने रिजवान को देखा, उसके चेहरे पर सिर फोड़ने का थोड़ा सा भी अफसोस नहीं, डर का नामो-निशान भी उसके चेहरे पर नहीं था। उसकी ढिठाई और निडरता देखकर मैम दंग रह गई। मैम ने रिजवान को डाँटा नहीं, बल्कि पुचकारते हुए बोली, ‘‘रिजवान, तुम तो बहुत अच्छे लड़के हो, आगे से ऐसी हरकत दोबारा मत करना।’’ और मैम ने उसे प्यार से बहुत कुछ समझाया।

दूसरे दिन मैम ने रिजवान को कक्षा में सबके सामने बुलाकर कहा, ‘‘तुम मेरी कक्षा के बहुत प्यारे लड़के हो।’’ मैम ने बच्चों से बुलवाया कि रिजवान एक बहुत ही अच्छा लड़का है। रिजवान अचंभित था। शायद पहली बार उसे उसकी बदमाशी के बदले में डाँट-मार की जगह प्यार मिल रहा था। जब भी मौका मिलता, मैम उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरती और समझाती। इस प्यार और स्नेह का रिजवान के कोमल मस्तिष्क पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ा। उसे महसूस हुआ कि कोई है, जो उसे प्यार करता है। धीरे-धीरे रिजवान की हरकतें कम होती चली गईं और उसका ध्यान पढ़ाई की ओर लगने लगा। कक्षा में वह ध्यान से लिखता और गणित के सवाल हल कर शिक्षक को दिखाता। एक समय ऐसा आया कि वह कक्षा में सभी बच्चों का चहेता बन गया।