डॉ. राम दयाल मुंडा

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डॉ. राम दयाल मुंडा (23 अगस्त, 1939-30 सितंबर, 2011) आदिवासी अस्तित्व और अस्मिता के प्रखर प्रवक्ता थे। वह न केवल एक भाषाविद्, नेतृत्वशास्त्री, शिक्षा शास्त्री थे, बल्कि भारत के एक प्रमुख बौद्धिक और सांस्कृतिक शख्सियत भी थे। उन्होंने राँची विश्वविद्यालय से अध्ययन किया था। इसके बाद शोध के लिए अमेरिका चले गए। शिकागो विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान में पी-एच.डी. की। अमेरिका में लंबे समय तक रहे। वहाँ कई विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया। राँची विश्वविद्यालय में जब जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग खुला तो उन्हें अमेरिका से राँची बुला लिया गया और यहाँ वे प्रोफेसर रहे। 1985 से 1986 तक उपकुलपति रहे। इसके बाद 1986 से 1988 तक कुलपति पद पर रहे।

झारखंड आंदोलन में डॉ. राम दयाल मुंडा की प्रमुख भूमिका रही। उन्होंने बौद्धिक रूप से इस आंदोलन को मजबूत करने का काम किया। आदिवासी अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ.) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी आवाज उठाई। झारखंड के ही नहीं, देश भर के आदिवासियों को संगठित करने का काम किया। वह राजनीति में भी सक्रिय थे, लेकिन वह मूलतः संस्कृति के आदमी थे। वे मांदर भी बजाते थे, बाँसुरी भी बजाते थे और गाते भी बहुत अच्छा थे। संस्कृत साहित्य का भी उन्हें गहरा ज्ञान था। इसके बाद 22 मार्च, 2010 को उन्हें राज्यसभा का सांसद मनोनीत किया गया। 2010 में ही उन्हें पद्मश्री का सम्मान भी मिला।

राज्यसभा में चुने जाने व राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के सदस्य होने के बावजूद न बाँसुरी में फूँक मारना छोड़ा, न मांदर पर थाप देना। मुंडाजी भाषा के जितने बड़े विद्वान् थे, उतने ही बड़े कवि भी थे। उनके प्रयास से ही संयुक्त राष्ट्र संघ में लंबी बहस के बाद प्रस्ताव पारित हुआ कि हर वर्ष 9 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाया जाएगा।

डॉ. मुंडा ने कई पुस्तकें लिखीं। आदिवासी अस्तित्व और झारखंडी अस्मिता के सवाल और आदि धरम की उनकी चर्चित पुस्तकें हैं। उनका एक सपना था कि गाँव-गाँव ‘अखरा’ बने। अखरा आदिवासियों का वह सामूहिक स्थल है, जहाँ नृत्य-गीत का कार्यक्रम होता है। बदलते समय में अखरा का अस्तित्व खत्म हो रहा था। इसको लेकर वह सदैव चिंतित रहते थे। राज्यसभा में जाने के बाद उन्होंने इसका खाका भी खींचा। वह एक आदिवासी विश्वविद्यालय भी खोलना चाहते थे, लेकिन कैंसर से उनके निधन के कारण उनका सपना अधूरा रह गया। मृत्यु से एक सप्ताह पहले उन्होंने अस्पताल से उठकर टैगोर हिल पर रवींद्र सांस्कृतिक केंद्र का शिलान्यास किया। इसके लिए उन्होंने राज्यसभा सांसद मद से एक करोड़ रुपए भी दे दिए, लेकिन यह आज तक पूरा नहीं हो सका। डॉ. रामदयाल केवल झारखंड के आदिवासियों की आवाज नहीं थे, वह देश के दस करोड़ आदिवासियों के प्रवक्ता थे। वह जितने विद्वान् थे, उतने ही सरल थे। यह उनकी खूबी थी।