झारखंड में मनाया जानेवाला प्रमुख पर्व : सोहराई पर्व

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झारखंड का यह पर्व मवेशियों के सम्मान का पर्व है। इस पर्व में हर मवेशी की पूजा की जाती है, उनका आदर-सम्मान किया जाता है। दीपावली के दिन इस पर्व को कुरमी जाति सहित कई अन्य जातियाँ मनाती हैं। वे इसे ‘बाँधना पर्व’ कहते हैं। आदिवासी इसे ‘सोहराई’ कहते हैं। यह मुयत: चार दिनों का पर्व है। पहले दिन काँचा दीया, दूसरे दिन गोरोया, तीसरे दिन बरद भीड़का और अंतिम दिन बुढ़ी बाँधना के रूप में मनाया जाता है। चरवाहा लोग नगाड़ा, ढोल, गाजे-बाजे के साथ लोकगीत गाते हुए अपने-अपने गाँवों के घरों में जाते हैं। यह घूमने की प्रक्रिया गोरोया पूजा तक चलती है। दीपावली के दिन मवेशियों को कार्य से मुति देकर, उन्हें नहला-धुलाकर पूरी साज-सज्जा के साथ उनकी पूजा की जाती है। काँचा दीया में चावल को कूटकर चुन्नी बनाई जाती है। इसी चुन्नी से दीपावली के दिन सरई पा में घी से सने पतले महीन कपडे़ की बा बनाकर प्रत्येक घर के दरवाजे में दीये जलाते हैं। इसके बाद रात में गो माता की पूजा की जाती है।

गोरोया पूजन : दूसरे दिन गोरोया पूजा की जाती है। इसमें कोई मिट्टी का पहाड़ बनाता है तो कोई महुआ की लकड़ी का पहाड़ बनाता है। गाय गोरोया के लिए लाल मुरगी की बलि दी जाती है और भैंस के लिए काले रंग की मुरगी की बलि। इसके साथ ही घोरौआ पीठा के साथ गोरोया-पूजा की जाती है। मवेशियों के लौटने के क्रम में महिलाएँ प्रवेश द्वार एवं आँगन को सजा-धजाकर आकर्षक बनाती हैं। दूब घास, फूल, रेंगनी के पौधे, चिरचिरी पत्थर के टुकडे़ का प्रयोग किया जाता है। चुन्नी या चावल के घोल से अल्पना बनाई जाती है।

बरद-भीड़का : इस दिन गाँवों के बीच के रास्ते में मजबूत खूँटा गाड़ा जाता है। उस खूँटे में साँड़ को बाँधा जाता है। घर की महिलाएँ धान, अरवा चावल एवं धूप से चुमावन करती हैं। इसके बाद बैल को नचाने के लिए मृत बैल का चर्म या लाल रंग का कपड़ा दिखाकर उसे भड़काया जाता है।

बूढ़ी बाँधना : इस दिन सभी प्रकार के मवेशियों को खूँटे से बाँधकर भड़काया जाता है। इस पर्व में नर मवेशियों को नहलाकर साफ-सफाई करते हैं तो महिलाएँ घर को लीप-पोतकर साफ करती हैं। दरअसल, सोहराई या बाँधना पर्व पशुधन का त्योहार है। इसके गीतों का एक बड़ा भाग कृषकों के प्रति मवेशी के महव का परिचायक है।

संताली समाज का सोहराय : संताली समाज सोहराय पर्व 14 जनवरी को मनाता है। यह पर्व एक सप्ताह पूर्व ही शुरू हो जाता है। इसमें एक-दूसरे के घर सपरिवार पहुँचकर खान-पान और नाच-गान किया जाता है। इससे पूर्व मवेशियों, पुरखों, खलिहान, सिंगबोंगा आदि की पूजा मुरगा या बकरे की बलि देकर की जाती है। गाँवों में गूँजते माँदर और नगाड़ों के ताल पर थिरकते पाँव इस पर्व की शुरुआत की घोषणा कर देते हैं।