झारखंड में मनाया जानेवाला प्रमुख पर्व : सरहुल पर्व

104 views

बसंत का मौसम आते ही आदिवासी समाज प्रकृति के स्वागत और पूजन की तैयारी में जुट जाता है। इस समय घर-गाँव एवं खलिहान धन-धान्य से भरे होते हैं और प्रकृति अपनी समूची सुंदरता के साथ इठला रही होती है। जीवनदायिनी और सुंदरता से भरपूर प्रकृति का स्वागत झारखंड के आदिवासी ‘सरहुल पर्व’ से करते हैं। यह प्रकृति के प्रति आभार, कृतज्ञता और पूजन का त्योहार है, जो महीने भर पूरे झारखंड में अलग-अलग तारीख को मनाया जाता है। हालाँकि पिछले 30 सालों से राँची में केंद्रीय स्तर पर एक दिन ‘सरहुल पर्व’ आयोजित होता है और इसी दिन सरकारी तौर पर राज्य में छुट्टी रहती है।

सरहुल आदिवासियों का बसंतोत्सव है। नववर्ष का स्वागत प्रकृति जंगल के इन्हीं फूलों से करती है और आदिवासी भी करते हैं। सरहुल मनाने के बाद ही वनोपज के साग-पात, फल-फूल खाने में उपयोग करते हैं। सरहुल के बाद खेतों में खाद की पटाई आरंभ हो जाती है।

सरहुल को मुंडा और हो आदिवासी ‘बाः’ पर्व, उराँव आदिवासी ‘खद्दी’, खडि़या ‘जंकोर’, संथाल ‘बाहा’ और सदान ‘सरहुल’ पर्व कहते हैं। सभी आदिवासी इस पर्व को बसंत महीने में मनाते हैं, लेकिन संथालों का सरहुल यानी ‘बाहा परब’ मकर संक्रांति के समय में मनाया जाता है।

सरहुल में ही नए वर्ष में मुंडाओं के आदि पुरखा लुटकुम हड़ाम, लुटकुम बूढ़ी एवं अन्य पुरखों को स्मरण करते हैं। सरहुल के पहले दिन हाइ काड़कोम अर्थात् मछली-केकड़ा पकड़ने का दिन होता है। इन दोनों ने पृथ्वी बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी स्मृति में यह दिन उनके नाम है। दूसरे दिन गोटा रंबड़ा-सुड़ा संगेन अर्थात् गोटा उरद दाल, अरवा चावल और बलि के मुर्गे के मांस को मिलाकर सरना स्थल ले जाया जाता है और वहीं उसे पकाकर खाया जाता है। तीसरे दिन पूरे गाँव में नाच-गान होता है।