झारखंड के महानायक : शहीद सिदो-कान्हू

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भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम सन् 1857 से पहले झारखंड में सन् 1855 में हूल हुआ। हूल यानी जनक्रांति। सन् 1855 का हुए इस हूल का क्षेत्र काफी व्यापक था। छोटानागपुर के रामगढ़ से लेकर संताल परगना तक। यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी, महीनों की तैयारी थी। उस समय चार सौ किमी. दूर तक सूचना देना और एक तिथि को एक जगह एकत्र होना, बड़ी घटना थी। इस हूल के पीछे ऐतिहासिक कारण थे और जिसके नायक थे चार भाई सिदो-कान्हू, चाँद-भैरव।

कहा जाता है कि दामिन ई-कोह का निर्माण सन् 1832 में अंग्रेजों ने किया। यही आज संताल परगना है। अंग्रेजों ने छोटानागपुर से संतालों को जंगल साफ करने और कृषि योग्य भूमि बनाने और बाद में रेल की पटरियाँ बिछाने के लिए सन् 1800 के आस-पास बसाना शुरू किया था। इसका मुख्य कारण संतालों का कठिन परिश्रमों और कठिन कार्य करने में निपुण होना था। संतालों को इस क्षेत्र में बसाने का एक और प्रमुख कारण था, पहाडि़या जनजाति द्वारा लगातार विद्रोह। उसे भी कम करने की अपनी नीति के चलते अंग्रेजों ने संतालों को इस क्षेत्र में बसाना शुरू किया। चालीस-पचास सालों में अच्छी-खासी संख्या में संताल बस गए, लेकिन अंग्रेजों ने संतालों के साथ भी वही अत्याचार शुरू कर दिया। इसका नतीजा यह रहा कि सन् 1855 में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमींदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संताल जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे ‘संताल विद्रोह’ या ‘संताल हूल’ कहते हैं। संताली भाषा में हूल शब्द का शाब्दिक अर्थ है विद्रोह। यह अंग्रेजों के विरुद्ध पहला सशस्त्र जनसंग्राम था। सिदो-कान्हू, चाँद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संताल हूल का नेतृत्व, शाम टुडू (परगना) के मार्गदर्शन में किया।

बरहेट के भोगनाडीह में सिदो-कान्हू, चाँद, भैरव, झानो-फूलों, भाई बहनों ने संघर्ष छेड़ दिया। 30 जून, 1855 को एक सभा बुलाई और जिसमें दस हजार संताल जमा हुए। जाहेर एरा ने बताया है कि सिदो तुम सूबा (राजा) हो और कान्हू सब सूबा। यह धरती तुम लोगों की है। अब तुम लगान वसूल करो। तब भोगनाडीह में मिट्टी का जाहेर थान बनाकर पूजा पाठ शुरू हो गया। दूसरे दिन पंचकटिया बाजार में स्थित देवी मंदिर में पूजा की।

हूल की सूचना पाकर दीघी थाना का दारोगा महेश लाल दत्ता वहाँ पहुँचा। विद्रोहियों ने उस दारोगा की हत्या कर दी। यह हूल की पहली कारगर घटना थी। 12 जुलाई को सिदो-कान्हू और भैरव ने सलामपुर लूटने के बाद पाकुड़ के जमींदार को लूटा। 13 जुलाई को पीरपैंती के निकट एक गाँव में रेल कर्मचारी जख्मी हुए। 16 जुलाई को पीरपैंती के निकट हथियारबंद संतालों के एक दल के साथ मेजर बर्रोस की सैनिकों के साथ मुठभेड़ हुई, जिसमें कुछ अधिकारी समेत 25 सैनिक मारे गए। 17 अगस्त को एक घोषणा की गई कि सभी विद्रोहियों को माफी दे दी जाएगी, पर विद्रोही नहीं माने। अंततः 10 नवंबर, 1855 को मार्शल लॉ की घोषणा कर दी गई। 19 अगस्त, 1855 को सिदो गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें 4 दिसंबर को निजामुत अदालत में पेश किया गया और फाँसी पर चढ़ा दिया गया। इसके करीब 3 महीने बाद 2 दिसंबर, 1855 के दिन कान्हू को भी गिरफ्तार करने में अंग्रेजी शासन सफल हुई। उन्हें 23 फरवरी, 1856 को 2 बजे दिन में बरहेट में सरेआम फाँसी दी गई। चाँद-भैरव पर भी मुकदमा चला और उन्हें सश्रम कारावास की सजा हुई।