झारखंड के महानायक : शहीद शेख भिखारी

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सन् 1857 की क्रांति को प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है; लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेजों से लड़ाई का सिलसिला सन् 1857 से पहले ही शुरू हो गया था। सन् 1857 की क्रांति ने पूरे देश में आजादी की चिनगारी को सुलगा दिया और इस चिनगारी से छोटानागपुर का पहाड़-पठार भी धधकने से बच नहीं सका। इस क्रांति में शेख भिखारी ने भी अहम भूमिका निभाई। एक सामान्य बुनकर परिवार में शेख भिखारी का जन्म सन् 1819 में झारखंड के ओरमाँझी थाना के खुदिया लोटवाँ गाँव में हुआ था। बचपन से वे अपना खानदानी पेशा मोटे कपड़े तैयार करते और हाट-बाजार में बेचकर अपने परिवार की परवरिश में सहयोग करते थे। जब वे 20 वर्ष के हुए तो उन्होंने छोटानागपुर के महाराज के यहाँ नौकरी कर ली। परंतु कुछ ही दिनों के बाद अपनी प्रतिभा और बुद्धिमा के कारण उन्होंने राजा के दरबार में एक अच्छी स्थिति प्राप्त कर ली। बाद में बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने उनको अपने यहाँ दीवान के पद पर रख लिया।

सन् 1856 में जब अंग्रेजों ने राजा-महाराजाओं पर चढ़ाई करने का मंसूबा बनाया तो इसकी खबर ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को मिली। उन्होंने अपने वजीर पांडेय गणपतराय, दीवान शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह से सलाह-मशविरा किया। उन सभी ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लेने की ठान ली और जगदीशपुर के बाबू कुँवर सिंह से पत्राचार किया। इसी बीच में शेख भिखारी ने बड़कागढ़ की फौज में राँची एवं चाईबासा के नौजवानों को भरती करना शुरू कर दिया।

अचानक अंग्रेजों ने जनरल मैकडोना के नेतृत्व में सन् 1857 में चढ़ाई कर दी। जब अंग्रेजों की फौज चुट्टूपालू के पहाड़ी रास्ते से राँची के पलटुवार पर चढ़ने की कोशिश करने लगी तो उनको रोकने के लिए शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह अपनी फौज लेकर चुट्टूपालू पहाड़ी पर पहुँच गए और उनका रास्ता रोक दिया। शेख भिखारी ने चुट्टूपालू की घाटी पार करनेवाला पुल तोड़ दिया और सड़क पर पेड़ों को काट-गिराकर रास्ता जाम कर दिया। शेख भिखारी की फौज ने गोलियों की बौछार कर अंग्रेजों के छके छुड़ा दिए। यह लड़ाई कई दिनों तक चली। शेख भिखारी के पास गोलियाँ खत्म होने लगीं तो उन्होंने अपनी फौज को पत्थर लुढ़काने का हुम दिया। इससे अंग्रेज फौजी कुचलकर मरने लगे। यह देखकर जनरल मैकडोन ने मुकामी लोगों को मिलाकर चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ने के लिए दूसरे रास्ते की जानकारी ली। फिर उस खुफिया रास्ते से चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ गए। इसकी खबर शेख भिखारी को नहीं हो सकी। अंग्रेजों ने शेख भिखारी एवं टिकैत उमराव सिंह को 6 जनवरी, 1858 को घेरकर गिरतार कर लिया और 7 जनवरी, 1858 को उसी जगह फौजी अदालत लगाकर मैकडोना ने शेख भिखारी और उनके साथी टिकैत उमराव को फाँसी का फैसला सुनाया।

8 जनवरी, 1858 को शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को चुट्टू पहाड़ी के बरगद के पेड़ से लटकाकर फाँसी दे दी गई। वह पेड़ आज भी वहाँ पर स्थित है। यह पेड़ आज भी हमें उनकी याद दिलाता है और यहाँ पर हर साल शहीद दिवस के मौके पर कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।