झारखंड के महानायक : पांडेय गणपत राय

142 views

बच्चो, सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कई भारतीय वीरों ने अपने सिर पर कफन बाँधकर अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजाया था। उनमें से अनेक क्रांतिकारियों के नाम आपने सुने होेंगे—झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडेय, वीर कुँवर सिंह और पांडेय गणपत राय आदि। पांडेय गणपत राय का जन्म 17 जनवरी, 1809 को झारखंड के लोहरदगा जिले में हुआ था। उनकी पढ़ाई-लिखाई शाही महल में उनके चाचा के पास हुई। राजमहल में रहने के कारण उन्होंने अनेक भाषाएँ—हिंदी, उर्दू, फारसी सीखीं। उन्होंने घुड़सवारी, तीरंदाजी, बंदूक और भाला चलाना भी यहीं सीखा। वे अपने बचपन से ही देखते आए थे कि अंग्रेज भारतीयों को बुरी तरह प्रताडि़त करते हैं और उन पर अमानवीय अत्याचार करते हैं। इससे उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा के भाव उमड़ चुके थे। इतना ही नहीं, वे अपने ही देश के उन भारतीय जमींदारों को भी हेय दृष्टि से देखते थे, जो अंग्रेजों के साथ मिलकर गरीब लोगों पर जुल्म ढाते थे। बचपन से ही देश-प्रेम की भावना उनके अंदर कूट-कूटकर भर गई थी। उन्हें समझ आ गया था कि अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा। उन्होंने अपनी खुद की सेना तैयार की और अंग्रेजों के विरुद्ध योजनाएँ बनानी आरंभ कर दीं। 1 अगस्त, 1857 को डोरंडा छावनी में सिपाहियों ने बगावत कर दी और 2 अगस्त को राँची विद्रोहियों के कब्जे में आ गया। यह देखकर अंग्रेजों के मन में गणपत राय का खौफ बैठ गया और उन्होंने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने की घोषणा करवा दी। एक दिन जब गणपत राय अपने एक संबंधी के घर पर रुके हुए थे तो उन्होंने ही अंग्रेजों को सूचित करके उन्हें पकड़वा दिया। अंग्रेजों ने आनन-फानन में 21 अप्रैल, 1858 को उन्हें फाँसी दे दी। और इस तरह यह महान् देशभक्त क्रांतिकारी हमेशा के लिए भारत माता की गोद में सो गया।