झारखंड के किले

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झारखंड में किलों की कमी नहीं है। यहाँ पर हम झारखंड के कुछ प्रमुख किलों के बारे में ही चर्चा करेंगे।

पलामू किला : पलामू जिले के डालटनगंज शहर से 30 कि.मी. दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित बेतला के घने जंगलों के बीच पलामू का ऐतिहासिक किला अपनी बेबसी और उपेक्षा के दंश को झेलता आज भी पूरी शानो-शौकत से खड़ा है। यहाँ का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से होते हुए रामायण और महाभारत से भी जुड़ता है। रामायण काल को लेकर यहाँ एक कथा प्रचलित है कि यह राजा दशरथ के अधीन था और श्रीराम के विवाह के अवसर पर उन्होंने यहाँ के बाजा बजानेवाले को बख्शीश में दे दिया था।

शाहपुर किला : डालटनगंज शहर के ठीक सामने कोयल के पश्चिमी तट पर चेरो राजा गोपाल राय के किले का निर्माण 1772 ई. में किया गया था। इस किले का दृश्य भी मनोहारी है। पास में कल-कल करती कोयल नदी बहती है। यह किला ईंटों से बना है। इसके बुर्ज पर तोप व बंदूक से फायर करने के लिए छिद्र बने हुए हैं। दूसरी मंजिल पर शीश महल है, यानी रनिवास। बुर्ज पर दो कोठरियाँ बनी हुई हैं। तीसरी मंजिल पर सभा-कक्ष है। सभा-कक्ष के द्वार पर सुंदर नक्काशी की गई है। भीतर की दीवारों पर बेल-बूटों की नक्काशी है। किले के सामने ही शाहपुर घाट है। घाट पर एक मंदिर भी है।

रातू किला : रातू राँची से 6 कि.मी. दूर है। यहीं पर नागवंशी राजा का विशाल किला है। नागवंशी राजाओं की राजधानी हमेशा बदलती रही है। सुतियांबे से लेकर चुटिया, पालकोट, डोयसागढ़, भैरों, अब रातू। यह अंतिम पड़ाव है। डोयसा को छोड़कर कहीं भी नागवंशी राजाओं के किले का पक्का निर्माण नहीं था। वर्तमान किले का निर्माण महाराजा उदयनाथ शाहदेव ने सन् 1870 में कराया था। निर्माण में 20 साल लगे। इसे कलकत्ता के अंग्रेज कंपनी के ठेकेदार द्वारा बनवाया गया। किले के दो द्वार हैं—एक पूरब की ओर, दूसरा पश्चिम की ओर। पूर्वी द्वार से घुसते ही बाईं ओर एक पार्क भी बना हुआ है। किले में 100 से ज्यादा कमरे हैं। पश्चिमी द्वार से अंदर जाते समय बाईं तरफ तोप भी रखी हुई है। इस द्वार के पास ही माँ दुर्गा व भगवान् जगन्नाथ स्वामी का मंदिर है।

नवरतनगढ़ किला : नवरतनगढ़ का किला करीब 100 एकड़ में फैला है। यह किला नागवंशियों द्वारा मुगल स्थापत्य का पहला राजमहल माना जाता है। अपने अनूठे मौलिक सौंदर्य व स्थापत्य कला के कारण खास पहचान बनानेवाले इस राजमहल का निर्माण 16वीं शताब्दी में नागवंशी राजा दुर्जन शाल ने कराया था। इस किले को ‘झारखंड का हंपी’ कहा जाता है।