झारखंड का राजकीय पुष्प पलाश

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पलाश का फूल देखा होगा आप सब ने। इसे टेसू का फूल, परसा, ढाक, किंशुक और केसू भी कहते हैं। एक फूल और इतने सारे नाम। जितने इसके नाम हैं उतना ही यह गुणकारी भी है। यह फूल बेहद आकर्षक चटक लाल रंग लिये हुए होता है। भारत के सभी स्थानों में यह फूल आसानी से मिल जाता है। पलाश अकसर जंगल की शोभा बढ़ाता है। इसके गुणों के कारण इसे झारखंड का राजकीय पुष्प घोषित किया गया है। पलाश के पत्ते एक दूसरे से गुँथे हुए होते हैं। एक-दूसरे से गुँथे होने के कारण ये हमें एकता का पाठ पढ़ाते हैं कि जिस तरह हम आपस में गुँथे हुए हैं, उसी तरह से पूरे देश के भारतवासी भी एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहें और खुशी के गीत गाते रहें। बसंत ऋतु शुरू होने के साथ गाँवों व जंगलों में पलाश के फूल खिलने शुरू हो जाते हैं। पलाश के फूलों से पूरा वातावरण सिंदूरी हो जाता है। सिंदूरी प्राकृतिक आभा वातावरण को बेहद सुंदर बना देती है और हर व्यक्ति को सुखी एवं खुश रहने का आशीर्वाद देती है। बच्चो, केवल पलाश के फूल ही नहीं बल्कि इसके पत्ते, टहनी, फली तथा जड़ सबका आयुर्वेदिक और धार्मिक दोनों तरह से बहुत महत्त्व है। पहले समय में होली के रंगों के लिए अकसर पलाश के फूल का ही इस्तेमाल किया जाता था। इसका रंग एकदम प्राकृतिक होता है, जो व्यक्ति की त्वचा के लिए लाभकारी होता है। यदि किसी को चर्मरोग है तो इस फूल को गुनगुने पानी में डालकर उससे चर्मरोग को दूर किया जा सकता है। यह प्राकृतिक और निःशुल्क इलाज है। पलाश की फलियाँ कीड़ों को भी नष्ट करती हैं। इसके उपयोग करने से बुढ़ापा जल्दी नहीं आता। गरमी के मौसम में यह पलाश का फूल बहुत उपयोगी है। पलाश फूल के पानी से स्नान करने से लू नहीं लगती और गरमी का अहसास नहीं होता। पलाश के पेड़ के पत्ते भी बहुत उपयोगी होते हैं। उनसे दोना-पत्तल बनाए जाते हैं। आप सभी ने दोना-पत्तल में कभी-न-कभी कुछ जरूर खाया होगा। ये दोना-पत्तल भी पलाश के पत्तों से ही बनाए जाते हैं। जिस तरह किसान भीषण गरमी में भी खेतों में लगकर काम करता है, उसी तरह पलाश का फूल भी लू के थपेड़ों से जूझता हुआ मुसकुरा कर लहराता रहता है और हर व्यक्ति को यह संदेश देता है कि मेहनत से काम करते रहो और जीवन में आगे बढ़ते रहो।