झारखंड का राजकीय पक्षी : कोयल

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कोयल को आपने जरूर देखा होगा। मधुर स्वर इसकी पहचान है। इसे कुकू व कोकिल के नाम से भी जाना जाता है। आम के पेड़ों पर अकसर कोयल मधुर आवाज में कूकती है। सुबह-सुबह कोयल का मधुर स्वर हर व्यति में जोश और उत्साह जगाता है, जिससे वह स्वयं को कामयाबी की राह पर बढ़ने के लिए तैयार करता है।

इसका वैज्ञानिक नाम ‘यूडाइनोमिस स्कोलोपेकिस’ है। कोयल झारखंड का राजकीय पक्षी है। बच्चो, कोयल का रंग देखा है आपने? इसमें नर कोयल नीलापन लिये काला होता है तो मादा तीतर की तरह धबेदार चितकबरी होती है। कोयल में नर कोयल की आवाज मीठी होती है और यह नर कोयल ही गाता है। कोयल की आँखें लाल व पंख पीछे की ओर लंबे होते हैं। कोयल पक्षी अपना घोंसला नहीं बनाता। कोयल को मधुर स्वर के साथ-साथ चालाक पक्षी के रूप में भी जाना जाता है, योंकि यह अपने अंडों को कौओं के अंडों के साथ रख देती है। इस तरह कौआ उन अंडों की पूरी देखभाल करता है। जब उनमें से बच्चे निकलते हैं तो कौआ ठगा-सा रह जाता है, योंकि उसमें से कौए का बच्चा नहीं बल्कि कोयल का बच्चा निकलता है और इस तरह कोयल अपने बच्चे को लेकर उड़ जाती है। हैरानी की बात है न कि अपने अंडे को दूसरों के अंडों के साथ रख देना या दूसरों के घोंसलों में रख देना। वैज्ञानिकों का इस बारे में कहना है कि ‘कोयल के अद्भुत पंख उसे दूसरे पक्षियों को खुद से दूर रखने में मदद करते हैं और इसी बात का लाभ उठाकर कोयल दूसरे पक्षियों के घोंसलों पर कजा करने में और अपने अंडे उनके घोंसलों में रखने में कामयाब होती है।’

कोयल भारतीय पक्षी है। यह देश के बाहर नहीं जाती; बस, मौसम के अनुसार इधर-उधर ही अपना स्थान परिवर्तन करती रहती है। कोयल कीट, लार्वा, कीड़े और फलों को खाती है। यह स्वभाव से संकोची होती है। इसका प्रिय आवास आम और मौलश्री के पेड़ हैं। सदाबहार घने वृक्षों पर रहकर कोयल अपनी मधुर आवाज से सबको मोहित करती है। कोयल पक्षी की 120 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। बच्चो, कोयल ज्यादातर एशिया और अफ्रीका में पाई जाती है।

बच्चो! कोयल का मधुर कंठ प्रकृति का वरदान है। सभी पक्षियों में इसे विशेष पक्षी माना जाता है। मानव कोयल से शिक्षा ग्रहण करता है। कोयल हमें सिखाती है कि हमेशा मीठा व मधुर बोलो और प्रकृति की खूबसूरती को हर दिन निखारो।