केले का छिलका

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हरीश स्कूल से घर आ रहा था। सड़क के किनारे फलों की एक दुकान थी। लाल-पीले फल देखकर वह दुकान पर रुक गया। उसने एक केला खरीदा। केला बहुत बढि़या था। चलते-चलते वह केला खाने लगा और छिलके को सड़क पर ही फेंक दिया।

‘‘आऽऽह!’’ एक बूढ़े का पैर छिलके पर पड़ा और वह फिसलकर गिर गया।

हरीश ने घूमकर देखा। बूढ़ा सिर पकड़कर छटपटा रहा था। ‘‘क्या हुआ, बाबा? उठो! कैसे गिर गए?’’ हरीश बूढ़े को सहारा देकर उठाने लगा। बूढ़े के सिर से खून बह रहा था। पैर में मोच आ गई थी।

तब तक और भी कई लोग वहाँ आ गए। लोगों ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, बाबा?  कैसे गिर पड़े?’’ बूढ़ा बड़ी मुश्किल से बोल पाया, ‘‘इस केले के छिलके से फिसलकर गिर गया।’’ इतना कहकर बूढ़ा बेहोश हो गया। सब लोग एक साथ शोर मचाने लगे, ‘‘उठाओ-उठाओ! इस बूढ़े को जल्दी अस्पताल पहुँचाओ, नहीं तो बेचारा मर जाएगा।’’ सब लोग मिलकर बूढ़े को अस्पताल ले गए।

हरीश दुःखी मन से घर गया। सीधे माँ के पास जाकर बोला, ‘‘माँ, मुझसे बड़ी भूल हो गई। मैंने केले का छिलका सड़क पर फेंक दिया। छिलके से फिसलकर एक वृद्ध गिर पड़े। उनका सिर फट गया। वह अस्पताल में  हैं। जल्दी चलो, माँ।’’

माँ यह सुनकर घबरा गईं। वह जल्दी-जल्दी हरीश के साथ अस्पताल गईं। अस्पताल में बूढ़ा पलंग पर लेटा था। उसके सिर पर पट्टी बँधी हुई थी। हरीश की माँ ने पलंग पर झुककर बूढ़े से पूछा, ‘‘कैसी तबीयत है, बाबा?’’

बूढे़ ने कहा, ‘‘अब अच्छा हूँ।’’

हरीश बोला, ‘‘बाबा, वह केले का छिलका मैंने सड़क पर फेंका था, जिससे फिसलकर आप गिरे थे। मुझे माफ कर दो, बाबा! अब मैं केले का छिलका इस तरह कभी नहीं फेंकूँगा।’’

बूढ़े ने हरीश को गले से लगा लिया।