अरविंद घोष

102 views

श्री अरविंद घोष का जन्म एक संपन्न बंगाली परिवार में 15 अगस्त, 1872 को हुआ था। उनका पारिवारिक माहौल पाश्चात्य संस्कृति में रचा-बसा हुआ था। उन्हें बचपन में अंग्रेजी महिला सँभालती थी, इसलिए वे बचपन से ही अंग्रेजी भाषा में पारंगत हो गए थे। श्री अरविंद की शिक्षा दार्जिलिंग और लंदन में हुई। उनके पिता उन्हें सिविल सर्विस में देखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अरविंद घोष को पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजा। अरविंद घोष बहुत सारी भाषाएँ जानते थे। इनमें बँगला, अंग्रेजी, फ्रेंच, संस्कृत और हिंदी प्रमुख थीं। अंग्रेजों के अत्याचार देखकर अरविंद का मन बचपन से ही साहित्य की ओर मुड़ गया था। वे अपने विचारों को कागज पर उतारते थे। कैंब्रिज विश्वविद्यालय से परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने आई.सी.एस. की परीक्षा दी, किंतु घुड़सवारी में रह गए। उन्हीं दिनों बड़ौदा के महाराज से उनका मिलना हुआ। सन् 1903 में उन्हें रियासत की नौकरी मिल गई। इसी दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति का अध्ययन भी किया। एक बार उनकी मुलाकात बाल गंगाधर तिलक से हुई। देश को स्वतंत्र कराने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ तिलक को देखकर श्री अरविंद घोष भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। उन दिनों जो लोग किसी देश में रियासत की नौकरी करते थे, वे राष्ट्रीय आंदोलन में भाग नहीं ले सकते थे, इसलिए उनके प्रत्येक कार्य पर कड़ी नजर रखी जाती थी। अरविंद घोष के मन में क्रांतिकारी बनने की भावना बलवती होती जा रही थी, इसलिए वे छिपे रूप से इन गतिविधियों में संलग्न रहे। सन् 1905 में बंग-भंग का आंदोलन शुरू होने पर वह कलकत्ता चले गए। वहाँ नेशनल कॉलेज में वे प्रिंसिपल के पद पर काम करने लगे। श्री अरविंद ने कार्यकर्ताओं को एकत्रित कर स्वराज की माँग की। कुछ समय बाद वह ‘वंदे मातरम्’ नामक पत्र के कार्यकारी संपादक नियुक्त किए गए। उन्होंने उस पत्र के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का निश्चय किया; पर अंग्रेजों ने उन्हें षड्यंत्रकारी के रूप में गिरफ्तार कर लिया। जेल से छूटकर आने के बाद लोगों ने उन्हें दलीय नेता बना दिया। मई 1908 में उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। अरविंद ने साधक की भाँति योग को अपना लिया। योग से उनके तन-मन को शांति मिली। उन्होंने लोगों को पाश्चात्य सभ्यता का बहिष्कार करने के लिए कहा। पूरा जीवन उन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए समर्पित कर दिया। वे ‘श्री अरविंद आश्रम, ऑरोविले’ के संस्थापक थे। पुदुचेरी में 5 दिसंबर, 1950 को उनका निधन हो गया।

बच्चो, श्री अरविंद घोष एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अत्यंत संपन्न परिवार में जन्म लेते हुए भी हमेशा संघर्ष और देश-सेवा को प्रमुख स्थान दिया। सभी को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए और अपनी मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए।